Mirambika Crisis: Archana’s sanguine Hindi poem – आशा दीप 

यात्रा दुर्गम और राह कंटीली

साथ चलने का समय है।

तम को हर ले, दीप संग ले

ज्योति जलती रहनी चाहिए ।

विश्वास और समर्पण से

पूजते थे जिनको वर्षों ।

उन पाषाण हुई प्रतिमाओं में

अब प्राण प्रतिष्ठा होनी चाहिए ।

जिस मोड़ पर हैं हम आज बैठे

खोने को अपने कुछ नहीं है ।

पाने को है खुला आसमान और

नन्हे पैरों को उनकी जमीं चाहिए ।

सत्ता, शक्ति और धन से

जीत होती है इसमें नया क्या ?

न्याय के लिए खड़े है  जो,

उनकी आज जय होनी चाहिए।

सच को लेकर चलने वाले

रह जाते हैं बस अकेले।

“मिराम्बिका” से है आस कि ये

रीती भी अब बदलनी चाहिए।

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One thought on “Mirambika Crisis: Archana’s sanguine Hindi poem – आशा दीप 

  1. SaveMirambika July 29, 2015 / 7:16 pm

    दो और दो का जोर हमेसा चार कंहा होता है
    ये समझ कुछ एलिट बेवकूफों को आनी चाहिए।
    ये धरना प्रदर्शन की नौटंकी बंद होनी चाहिए
    मिराम्बिका के भविष्य के लिये कुछ मिलजुल कर करना चाहिये।

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